न जाने
क्यों आज उसका चेहरा आँखों के आगे से हट नहीं रहा है ,चाहे कितना भी मन बटाने के लिए , अपने को अन्य कामों में व्यस्त कर लू , या टी वी ऑन करके अपना मनपसंद कार्यक्रम देख
कर उसे भूलने की कोशिश करू , -बार बार उसका मासूम चेहरा , खिलखिलाती हँसी और हाँ खनकती चूड़ियाँ मेरा ध्यान अपनी ऒर
वैसे ही खीच ले जाती है जैसे तेज हवा का झोका किसी तिनके को उड़ा ले जाये। .......... आज कितने वर्षो
बाद मिली थी वो ,
आह !वो भी
इस रूप में..... इस हालत में। बचपन से जानती थी उसे , हमारे घर से दो घर छोड़ कर रहने वाले शर्मा अंकल के यहाँ किरायेदार बनकर आये थे वो लोग।
माँ ने
बताया था ,
उनकी एक लड़की है , मुझसे 4
साल छोटी, बिलकुल गुड़ियाँ जैसी …… उस समय मेरी उम्र कोई दस साल होगी , बहुत शौक था मुझे छोटी बहन का ....इसीलिए
बहुत उत्सुकता थी उसे देखने की , जिस दिन उनका सामान उतर रहा था मैं बालकनी में खड़े -खड़े उसे देखने की चेष्टा कर रही थी. सब सामान उतरने के बाद
उतरी थी वो नन्ही परी
अपनी माँ की
अंगुली थाम कर, जैसे मक्खन से बनी हुई हो , छूते ही पिघल जाएगी , ओह! मैंने नज़र फेर ली , कही मेरी ही नज़र न लग जाये। तभी उसकी
माँ का स्वर सुनाई पड़ा " रिया उधर बैठ जाओ बेटा " और वो चुप- चाप निर्दिष्ट जगह पर बैठ गयी।
यह था रिया से मेरा पहला परिचय। उसके बाद जैसे- जैसे उसे जाना , वो उतनी ही प्यारी उतनी ही कोमल ,उतनी ही मासूम लगी।. उसके मुँह में तो जैसे जुबान ही नहीं थी। बेहद शांत ... न रोती न चिल्लाती बल्कि कोई
और चिल्ला रहा हो तो माँ की गोद में छिप जाती, और सबसे खास थी उसकी हलकी सी मुसुकुराट , जरा से होंठ टेढ़े कर के जब वो
मुस्कुराती ,
सच्ची
बिलकुल मधुबाला जैसी लगती ,
हम बच्चे
अक्सर उसे छेड़ते ,
"रिया , मुस्कुरा न एक बार , बस एक बार ...प्लीज ... और रिया मुस्कुरा
देती ,
फिर हम सब
ताली बजाते "वाह रिया वाह "
