वसन्त ऋतु तो अपनी दस्तक दे चुकी है , वातावरण
खुशनुमा है ,पीली सरसों से खेत भर गए है, कोयले
कूक रहीं हैं पूरा वातावरण सुगन्धित और मादक हो गया है ....उस पर १४ फरवरी भी आने
वाली है .... जोश खरोश पूरे जोर –शोर पर
है ,सभी बच्चे बच्चियाँ ,नव युवक –युवतियाँ नव प्रौढ़ –प्रौढ़ाये ,बाज़ार ,टी .वी
चैनल ,पत्र –पत्रिकाएँ
आदि –आदि
प्रेम प्रेम चिल्लाने में मगन हैं | हमारे मन
में यह जानने की तीव्र इक्षा हो रही है कि ये प्रेम आखिर कितने प्रकार होते
है ,दरसल जब हम १७ ,१८ के हुए तभी चोटी पकड़ कर
मंडप में बिठा दिए गए .... बाई गॉड की कसम जब तक समझते कि प्रेम क्या है तब तक
नन्हे बबलू के पोतड़े बदलने के दिन आ गए फिर तो बेलन और प्रेम साथ –साथ चलता रहा ....( समझदार
को ईशारा काफी है ) हां तो मुद्दे की बात यह है रोमांटिक फिल्मे देख –देख कर और प्रेम –प्रेम सुन कर हमारे कान पक
गए हैं और हमने सोचा की मरने से पहले हम भी जान ले की ये प्रेम आखिर कितने प्रकार
का होता है इसीलिए अपना आधुनिक इकतारा ( मोबाइल )उठा कर निकल पड़े सड़क
पर (आखिर साठ की उम्र में सठियाना तो बनता ही है) |सड़कों पर
हमें तरह –तरह के
प्रेम देखने को मिले ,प्रेम के यह अनेकों रंग हमें मोबाईल की बदलती रिंग टोन की तरह
कंफ्यूज करने वाले लगे .... सब वैसे का वैसा आप के सामने परोस रही हूँ
..................
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मंगलवार, 10 जनवरी 2017
होली पर इंस्टेंट गुझियाँ मिक्स मुफ्त :स्टॉक सीमित
होली और
गुझियाँ का चोली दामन का साथ है |”सारे तीरथ
बार –बार और गंगा सागर एक बार “की की
तर्ज पर गुझियाँ ही वो मिठाई है जो साल में बास एक
बार होली पर बनती है |जाहिर है
घर में बच्चों –बड़ों सबको
इसका इंतज़ार रहता है ,और
गुझियाँ का नाम सुनते ही बच्चों के मुँह में व् महिलाओं के माथे पर पानी आ जाता है
|कारन यह है कि गुझियाँ खाने में जितनी
स्वादिष्ट लगती है पकाने में उतनी ही बोरिंग|एक –एक लोई बेलो ,भरो ,तलो .... बिलकुल चिड़िमार काम |अकसर होली
के आस –पास महिलाएं जब एक दुसरे से मिलती हैं तो पहला प्रश्न यही होता
है “आप की गुझियाँ बन गयी ?और अगर
उत्तर न में मिला तो तसल्ली की गहरी साँस लेती है “एक हम ही
नहीं तन्हाँ न बना पाने में तुझको रुसवा “पर बकरे की
माँ कब तक खैर बनाएगी ,बनाना तो सबको पड़ेगा ही ..... शगुन जो ठहरा |
लो भैया ! हम भी बन गये साहित्यकार
कहते हैं की दिल की बात अगर
बांटी न जाए तो दिल की बीमारी बन जाती है और हम दिल की बीमारी से बहुत डरते हैं ,लम्बी -छोटी ढेर सारी
गोलिया ,इंजेक्शन
,ई सी
जी ,टी ऍम टी
और भी न जाने क्या क्या ऊपर से यमराज जी तो एकदम तैयार रहते हैं ईधर दिल जरा सा
चूका उधर प्राण लपके ,जैसे
यमराज न हुए विकेट कीपर हो गए..... तो इसलिए आज हम अपने साहित्यकार बनने
का सच सबको बना ही देंगे।ईश्वर को हाज़िर नाजिर मान कर कहते है हम जो भी
कहेंगे सच कहेंगे अब उसमें से कितना आपको सच मानना है कितन झूठ ये आप के ऊपर
निर्भर है।
गाडी भई सौतन हमार
बचपन में सहेलियों के साथ अक्सर एक पुराना गाना
सुना करते थे। …………
"छोटा सा बँगला हो बंगले में गाडी हो
गाडी में मेरे संग बलमा
अनाड़ी हो
"
उम्र ही
कुछ ऐसी थी कि चाहते न चाहते आँखों में सपने आ ही जाते थे .... और हमने भी एक
अदद बलमा और एक अदद गाडी का सपना पाल ही लिया। खैर शादी हुई और बलमा मिलने का सपना
साकार हुआ। .... अब बचा गाडी का सपना। .... हमे यह जानकार बहुत ख़ुशी हुई कि इस
गाडी के सपने में हमारे बलमा हमारे बराबर के साझीदार हैं। पर किसी मध्यमवर्गीय
परिवार के लिए गाडी का सपना पूरा करना इतना आसान नहीं होता है। हम अपने सपने
के प्रति पूरी तरह से वफादार थे लिहाज़ा हमने अपने खर्चों में कटौती की ,कितनी बार बाज़ार से गुज़रते
समय हम आखें फेर लेते कि कहीं शो रूम में करीने से लटकी रेशमी
सिल्क की साड़ियां हमें पुकार न लें "जानेमन एक नजर देख ले ,तेरे सदके इधर देख
ले"चाट का ठेला वाला अपना तवा टनटनाता रहता और हम जुबान पर पत्थर रख कर आगे
बढ़ जाते। सोने चांदी के जेवरों की कौन कहे हालत तो यह थी की डिज़ाइनर चूड़ी बिंदी भी
दुकानों भी हम से पुकार
-पुकार कर कहती "इस तरह तोडा मेरा दिल ,क्या मेरा दिल दिल न था "यहाँ तक की हमने अखबार भी मंगाना बंद
कर दिया। ....
शुक्रवार, 6 जनवरी 2017
हमने भी करी डाई - ईटिंग
लेख का शीर्षक देख कर ही आप हमरी सेहत और उससे उत्पन्न परेशानियों के बारे में अंदाजा लगा सकते हैं |आज के ज़माने में मोटा होना न बाबा न ,ये तो करीना कपूर ब्रांड जीरो फीगर का युग है ,यहाँ मोटे लोगों को आलसी लोगों की कतार में बिठाते देर नहीं लगती|यह सब आधुनिक संस्कृति का दोष है हमें आज भी याद है कि हमारी दादी अपने ८० किलो वज़न के साथ पूरे शान से चलती थी और लोग उन्हें खाते –पीते घर वाली कह कर बात –बात पर भारत रत्न से सम्मानित किया करते थे |पर आज के जामने में पतला होना स्टेटस सिम्बल बन गया है ,आज जो महिला जितने खाते –पीते घर की होती है वो उतनी ही कम वजन की होती है ,क्योकि उसी के पास ट्रेड मिल पर दौड़ने हेतु जिम की महंगी फीस चुकाने की औकात होती है या उसके पास ही ब्रेकफास्ट और सुबह के नाश्ते की जिम्मेदारी नौकरों पर छोड़ कर मोर्निग वाक पर जाने का समय होता है ….. बड़े शहरों में तो महिला का वजन देख कर उसके पति की तनख्वाह का अंदाजा लगाया जाता है,कई ब्यूटी पार्लर में महिलाओं का वजन देख कर पति की तनख्वाह बताने वाला चार्ट लगा रहता है,इसी आधार पर उनके सिंपल ,गोल्डन या डाएमंड फेसियल किया जाता है …..
जस्ट लाइक &कमेंट
फेस बुक पर आने के बाद देखा तो हमने भी था कि कुछ लोग इसे विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम समझते हैं और कुछ अपनी तस्वीरों की |खैर जिसकी जैसी इच्छा सोच कर हमने तो चुप रहने में ही भलाई समझी पर आज शाम को घर आते वक्त मिसेज चावला मिल गयी |बड़ा उदास सा मुँह बना रखा था |हम तो टमाटर और भिन्डी खरीदने के बाद उनके दामों में हुई वृद्धि और उससे घर के बजट बिगड़ने कि गणित में उलझे हुए थे तभी मिसेज चावला हमारी आँखों के आगे आ गयी उनका चेहरा तो हमारी सस्ती भिन्डियों से भी ज्यादा मुरझाया हुआ था |घबरा कर हमने पूंछा क्या हुआ ,बीमार हो क्या ? ये क्या हाल बना रखा है ,कुछ लेती क्यों नहीं? हमारे इतने सारे प्रश्नो के उत्तर में बुरा सा मुँह बना कर बोली “क्या बताएं मेरे तो ५००० रुपये पर पानी फिर गया |
शनिवार, 14 मई 2016
देश पी एल वी ( पुरूस्कार लौटाओ वायरस ) की चपेट में
सच का हौसला की विशेष रिपोर्ट
सर्दी का मौसम दस्तक दे चूका है पर अभी भी देश का राजनैतिक तापमान बहुत गर्म है | हमारे विशेष संवाददाता के अनुसार ये जो पुरूस्कार लौटाने का नया चलन चला है | उसने सबको अपनी चपेट में ले लिया है | रोज़ -रोज़ पुरूस्कार लौटाने की ख़बरों से देश के अलग -अलग वर्गों के लोगों पर क्या असर पड़ा है | यह देखने के लिए राष्ट्रीय दैनिक समाचार पात्र “सच का हौसला” की टीम ने देश के हर उम्र , वर्ग के लोगों से बातचीत की | नतीजे चौकाने वाले हैं | आइये आप को भी इस अभूतपूर्व सर्वे की जानकारी दे दे |
सबसे पहले सच का हौसला की टीम बच्चों के स्कूल में गयी | अधिकतर छोटे बच्चे रोते नज़र आये | बच्चों को टॉफ़ी चोकलेट से बहला कर पूंछा तो बच्चे बोले , ” आंटी ये पुरूस्कार लौटने वाले लोग अच्छे नहीं हैं | क्यों के उत्तर में बच्चे सुबकते हुए बोले ,” पहले तो हमें केवल उन्ही लोगों के नाम याद करने पड़ते थे जिन्हें पुरूस्कार मिला था अब उनके भी रटने पड़ेंगे जिन्होंने लौटाए |
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