शनिवार, 14 मई 2016

हत्यारा प्रेम

 हत्यारा प्रेम

आज जब वैलेंटाइन वीक में प्रेम हवाओं में तैर रहा है लोग बांहों में बांहे डाले जीवन भर प्यार निभाने की कसमें खा रहे हैं | एक दूसरे को गिफ्ट दे रहे हैं | वही दिल्ली की आरजू को उस प्रेमी ने जिसके साथ उसने प्यार की कसमें खायी थी , तोहफे में मौत दी | यह कहानी दिल्ली के मॉडल टाउन इलाके की है . इसी मोहल्ले में घर आरजू और एक नवीन खत्री का घर था . आरजू डी यू के लक्ष्मी बाई कॉलेज के फाइनल ईयर की स्टूडेंट थी . जबकि नवीन पढ़ाई छोड़ प्रॉपर्टी डीलिंग के धंधे में उतर गया था. दोनों की मुलाकात होती है, फिर प्यार | उसके बाद दोनों शादी करने की इक्षा जताते हैं |परन्तु गांव के गोत्र के हिसाब से लड़के वालों को दोनों की शादी से एतराज था. मगर रिश्ता अधूरा छूट जाने के बाद भी आरजू और नवीन मिलते रहते हैं . यहां तक कि नवीन की शादी कहीं और तय होने के बाद भी .

नवीन को पति के रूप में पाने की आरजू की इक्षा उसे फिर नवीन के पास ले आती है | नवीन उससे झगडा करता है | फिर उसकी हत्या कर देता है | लव और हत्या का यह कांड यहीं तक नहीं ठहरता | वह आरजू को अपने हाथों से उठा कर पहले अपने बीएड फिर अपने वेंटिलेटर में छिपा देता हैं | फिर शादी रचाता है यहाँ तक की अपनी पत्नी के साथ उसी कमरे में प्यार भरी सुहागरात मनाता है | जहाँ प्यार की आरजू की मृत देह अभी भी याचना कर रही है | इस बार प्रेम की नहीं | हां इतनी याचना की उसका शव उसके परिजनों को मिल सके |
ये एक किस्सा नहीं है| एक सत्य घटना है | पर ऐसे सत्य आज हर गली हर शहर में हैं | पर ऐसे किस्से सोचने पर विवश करते हैं की ऐसा क्यों ? शायद आज प्यार एक टाइम पास है | मन बहलाने का साधन | जिसे युवाओं की भाषा में ऐश कहा जाता है | दुर्भाग्य से बड़ी संख्या में युवा लड़के ही नहीं लडकियां भी इस की गिरफ्त में हैं | जहाँ यह सोच कर प्रेम किया जाता की प्रेम का रिमोट अपने हाथ में रखना है | जब तक निभी ,निभी नहीं तो चैनल चेंज कर दिया | एकनिष्ठ प्रेम की तड़फ और उसे पाने का आनंद दोनों किताबी बातें हैं |
प्रेम जिसमें प्रिय के हाथ में लगी खरोंच भी असहनीय होती थी | वहां तेज़ाब फेंकना , हत्या करना , शव के टुकड़े करन जैसे किस्से अक्सर सुनने को मिलते हैं | कई न्यूज़ वेबसाईट पर ऐसे दर्जनों लेख भरे पढ़े हैं , ब्रेक अप के बाद कैसे संभले | उन पर क्लिक भी बहुत ज्यादा हैं | दिल टूटना और दुबारा किसी दूसरे के साथ जुड़ना आम बात है |
कहीं न कहीं प्रेम की अति उपलब्धता इसकी वजह है |यह दुर्लभ फल या नायब हीरा नहीं है जिसे सहेज कर रखना है | ” प्रेम हाट बिकाय ” हो गया है |प्रेम साथ -साथ घूमना , पिक्चर देखना , पॉप कॉर्न खाना व् ब्रश और बेड शेयर करना हो गया है | प्रेम भावना हीन हो गया है | इसलिए महत्वहीन हो गया है सोशल मीडिया पर मामूली चैट से शुरू रिश्ते साल भर में संयोग और वियोग दोनों झेल लेते है | और फिर जैसे शर्ट की धूल झाडी हो वैसे ही झाड कर दुसरे प्रेम की तलाश में जुट जाते हैं | आज प्रेम मात्र देह तक सीमित रह गया है | जो कुछ समय बाद बासी पड़ जाता है | विरक्ति उत्पन्न करता है |जब प्रेम है ही नहीं तो रास्ते से हटाने की बात मन में आना स्वाभाविक है | क्योंकि विवाह के लिए आज भी भारतीय मानसिकता ऐसे साथी की है जो एक जनरेशन पहले थी | साथ ही बिना प्रेम के प्रेम के देह बंधन में बंधे ये जोड़े विवाह के समय माता -पिता और सामाज से विद्रोह कर अपने प्रेम को पाने के स्थान पर व् प्रेमी /प्रेमिका को रास्ते से हटाने का क्रूर कार्य करते हैं |
प्रेम का हत्यारा होना पूरे समाज की समस्या है | कहीं न कहीं प्रेम के प्रति उत्तरदायित्व की भावना के स्थान पर मात्र मौज -मस्ती की भावना या समाज द्वारा ऐसे रिश्तों को स्वीकृत न किया जाना भी इसकी जड़ में हो सकता है |जो भी हो आकर्षण को प्रेम की कैद से मुखत कर प्रेम को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है | और प्रेम हत्याओं के अपराध के कारणों व् उनकी गहन मनोवैज्ञानिक पड़ताल जरूरी है |
वंदना बाजपेयी

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