यह एक खोज है ढूँढने की इतने बड़े आसमान में मुट्ठी भर "अपना आसमान ".
है कहाँ सामर्थ्य खोले शब्द मन की कुप्पियाँ
आत्म होता जब तिरोहित बोलती तब चुप्पियाँ
आ बसे संवाद जबसे मौन बनकर प्राण में
मिट रहा जब द्वैत माया ले रही है झप्पियाँ
बाजपेयी वंदना