सोमवार, 9 जनवरी 2017

शुक्रिया फेसबुक







बचपन में हम सब नें कक्षा ५ से ८ के बीच में एक निबंध जरूर लिखा होगा "विज्ञानं वरदान या अभिशाप "इसमें हम विज्ञानं के अच्छे बुरे पहलुओं को लिखने के बाद एक निष्कर्ष निकालते थे …… कि यह हमारे ऊपर   है की हम विज्ञानं का किस प्रकार प्रयोग करते हैं।  हम चाहे तो मुट्ठी भर यूरेनियम से हज़ारों मेगावॉट की बिजली बना कर कोई घरों में उजाला कर सकते हैं या परमाणु बम बना कर पूरी की पूरी सभ्यता समाप्त कर सकते हैं।
    कुछ -कुछ यही बात हमारी फेस बुक पर भी लागू होती है , हम चाहे तो इसे मात्र फालतू मैसज करने , श्लील - अश्लील फोटो अपलोड करने या  महज चैटिंग करके अपना और दूसरों का समय बर्बाद करने का अड्डा  बना सकते हैं या फिर कविता कहानी और लेख के माध्यम से अपने विचारों के विनिमय का केंद्र बना सकते हैं।  मैंने खुद अपने ऍफ़ बी के छोटे से जीवनकाल में ………  यहाँ  शुरू कर सफलता का नया अध्याय लिखने वाले अनेकों रचनाकारों को देखा है, तो इक्षा हुए क्यों न इस विषय पर एक छोटा सा शोध किया जाये।
                                 सबसे पहले तो मैं क्षमा याचना सहित इस वक्तव्य का खंडन करना चाहूंगी "कि फेस बुक पर लिख कर कोई साहित्यकार नहीं बन सकता। "
जरा सोचिये कबीर दास जी नें  तो कागज़ पर भी नहीं लिखा था ………… "मसि कागद छुओ नहीं ', उनके शिष्यों नें उनके काम का संकलन किया था। तब उनका काम हमारे सामने आया अन्यथा हम कबीर दास जी के श्रेष्ठ साहित्य से वंचित ही रहते।  प्रतिभा का सामने आना जरूरी है। आज के युग में फेस बुक नव -रचनाकारों को एक मंच उपलब्ध करा रहा है।  नव प्रतिभाओं को पहचाना जा रहा है , और उन्हें अपना आकाश मिल रहा है।
                                                 अब तक कितने चूजे डर  कर अपने पंख  समेट  लेते थे जब उन्हें पता चलता था की साहित्य के आकाश में मठ होते हैं जो तय करते हैं कौन उठेगा ,कौन गिरेगा। किसको स्थापित  किया जायेगा किसको विस्थापित।कम से कम हर रचनाकार यह तो चाहता है कि उसकी रचना पाठकों तक पहुँचे।  रचना के लिए पाठक उतने ही जरूरी हैं जितना जीने के लिए ऑक्सीज़न।  इन मठाधीशों के चलते कितनी रचनायें घुट -घुट कर दम  तोड़ देती थी और साथ में दम  तोड़ देता था रचनाकार का स्वाभिमान ,उसका आत्मविश्वास। यह एक ऐसी हत्या है जो दिखती नहीं है।  कम से कम फेस बुक नें रचनाकारों को पाठक उपलब्ध करा कर इस हत्या को रोका है।
                महिलाओ की बात करु तो , न जाने कितनी महिलाएं ऐसी हैं जिनमें प्रतिभा तो थी पर  घर गृहस्थी में ऐसी उलझी की कब कलम की धार कुंद  हो गयी पता ही नहीं चला।  एक अरसे बाद जब उन्होंने कलम उठाई तो भय सा हुआ "क्या मेरा लेखन अब स्वीकृत होगा ?" तब ऍफ़ बी ने कहा "तुम मुझे कलम दो मैं तुम्हें मुकाम दूँगा " और आज वोविभिन्न प्रतिष्ठित साहित्य पत्रिकाओं में दस्तक देरही हैं।
                   अब मुझ नाचीज की बात करू तो.……कक्षा ४ में अपनी पहली कविता लिखी थी। उसके बाद जब जब मन में विचारों की लहरें हिलोरे मारती , शब्दों की पतवार ले कर वाक्यों की नाव मन आँगन में तैरने लगती तब खुद ब खुद कलम डायरी पर , पुराने अख़बार पर , टेलीफ़ोन डायरेक्टरी पर चलने लगती।जब यह काम घरवालों की नजर में आया तो उन्होंने लिखने के लिए प्रेरित किया।  मन में एक डर था, क्या मेरा लेखन इस लायक है की कोई पढ़े , और किसी को पढ़ने के लिए भेजू  तो कहाँ ,किसे ?अंततः फेस बुक की शरण में आई। यहां मेरे काम को सम्मान मिला , अनेकों पत्र -पत्रिकाओं में स्थान मिला। लेखन से लेकर संपादन तक का सफर बहुत खूबसूरत रहा | 
                       
                                                  अंत में अपनी बात पर कायम रहते हुए मैं कहना चाहती हूँ, किसी भी साहित्य को जो पाठकों की , संपादकों की , रचनाकारों की कसौटी पर शिल्प , भाव,  संवेदनाओं व् प्रस्तुतीकरण के आधार पर खरा उतरता है चाहे वो फेस बुक में ही क्यों न लिखा गया हो उसे फसबुकिया साहित्य कह कर अपमानित नहीं करना चाहिए।   मैं अमीश त्रिपाठी की "इममॉर्टल्स ऑफ़ मेलुहा '"को उदाहरण के तौर पर पेश करना चाहती हूँ ,जिसे शुरू में कोई प्रकाशक नहीं मिल रहा था फिर उसके कुछ अंश फेस बुक में डालने के बाद कहानी के प्रति प्रकाशकों व् पाठकों की रूचि बढ़ी। .......... जैसा की सर्व विदित है इस किताब ने "बेस्ट सेलर ' के नए कीर्तिमान स्थापित किये।
                                                किसी ने सच कहा है "प्रतिभा जन्मजात होती है बस उसे लिखते -लिखते  परिमार्जित करना पड़ता है ठीक हीरे की तरह ……………… तभी दिख पाती  है उसकी असली चमक। ऐसे में बहुत जरूरी है एक ऐसा मंच जहाँ नव रचनाकार लिखे ,, निखरे और सीधे उसकी रचनायें पाठकों तक पहुँचे। , उसके काम को पहचाना जाये, किसी गुट  बंदी का शिकार हुए बिना, मठाधीशों के आगे सर झुकाएं बिना। फेस बुक यह काम बखूबी से कर रहा है।


       मैं गुम  सी हो रही थी अपने विचारों की भीड़ में 
      तुम मसीहा बन के आये रास्ता दिखला दिया 


             " शुक्रिया फेस बुक "
  

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